Fir Bhi Waqt Nahin Hai || फिर भी वक़्त नहीं है
आदमी की जगह मशीनें काम कर रही हैं
फिर भी वक़्त नहीं है
जाने कैसी बिडम्बना है ,जाने कैसी जल्दी है
घडी की सुईयां तो आगे भागी जा रहीं हैं
मगर समय कहीं पीछे छुटता जा रहा है
अब मिट्टी के चूल्हे में कोई फूंक नहीं मारता
अब किसी का घर धुएं से नहीं भरता
अब गैस स्टोव और इंडक्शन जल रहा है
उसको भी हर घर में काम वाली जला रही हैं
फिर भी वक़्त नहीं है
कपडे धोने की अलग मशीन,सुखाने की अलग
सफाई की अलग तो, बाल सँवारने की अलग
मसाले के लिए मशीन ,वर्कआउट के लिए मशीन
संवेदना हो न हो ,सुविधाएँ बढ़ती जा रही हैं
हर किसी का काम बस मशीनें करती जा रही हैं
फिर भी वक़्त नहीं है
घर के हर कोने से तरह तरह की आवाजें आती हैं
मगर दिलों में एक खालीपन सा है
किसी से मिलने मिलाने का समय नहीं
एक दूसरे से बात करने का वक्त नहीं
बातें मुलाकातें अब चैटिंग और टाइपिंग में समा गयी
जाने किस दौर से गुजर रहे हैं हम
हर रोज नयी मशीनें तो चलती जा रही हैं
मगर, जिंदगी जैसे रूकती ठहरती जा रही है
फिर भी वक़्त नहीं है
आदमी की जगह मशीनें काम कर रही हैं
फिर भी वक़्त नहीं है
धन्यवाद्
सुनीता श्रीवास्तवा

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