School Ke Din II स्कूल के दिन
दोस्तों "ये कविता मैंने बचपन के स्कूल के दिनों को याद करते हुए लिखी है ,जब स्कूल की गलियां, नटखट दोस्त हमारी जिंदगी का खूबसूरत हिस्सा हुआ करते थे ,लगता था दुनिया में और कुछ है ही नहीं ,समय बदल जाता है , हम छोटे से बड़े हो जाते हैं ,मगर आज भी उस रास्ते गुजरो तो वो मासूमियत दिल को छू लेती है।

आज उन गलियों से गुजरे तो याद आया ,
कभी उन रास्तों पर मेरा आना जाना था
सालों साल गुजर गये इस बात को ,
मगर आज दिल बोल उठा ,वो भी क्या जमाना था
स्कूल के वो दिन ,वो अल्हड़पन ,वो भोलापन ,
वक़्त की धुप में दब गए ,फिर भी महकते हैं
कुछ याद दिलाते हैं ,कुछ तो मुझसे कहते हैं
हर दिन एक नयी कहानी ,एक नया फ़साना था
आज उन गलियों से गुजरे तो याद आया ,
कभी उन रास्तों पर मेरा आना जाना था
वो उछलना रुक जाना और फिर से,उछलना
बेवजह ही. पत्थरों को ठोकर मार खुश हो जाना
वो पेड़ों की ठंडी छावं,खिलखिलाहटों के शोर
स्कूल के वो चुलबुले दोस्त ,वो भी क्या याराना था
आज उन गलियों से गुजरे तो याद आया ,
कभी उन रास्तों पर मेरा आना जाना था
वो हलकी सी बारिश होने पर भी रैनी डे की छुट्टी
स्कूल ना जाने का एक खूबसूरत बहाना था
स्कूल में मॉनीटर बन जाना ,कैसा वो अहसास होता
जैसे कितना बड़ा ओहदा मिल गया हमें
चलाया करते हुकुम ,करते थे तानाशाही ,
क्लास में ,खुद को सबसे ऊपर जो दिखाना था
आज उन गलियों से गुजरे तो याद आया ,
कभी उन रास्तों पर मेरा आना जाना था
धन्यवाद्
NiCe Poem
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