Bachat Per Kavita || बचत पर कविता

हाथ में पैसे आते हैं ,खर्च हो जाते हैं,
समझ नहीं आता कहाँ चले जाते हैं ,
मुठी से सरक रही हों जैसे ये मुद्राएं ,
अनचाहे खर्चे हर रोज बढ़ते जाते हैं
मगर ,बचत की आदत डालना होगा ,
बूँद बूँद से ही सागर बनता है ,
इस तथ्य को मुझे आजमाना होगा ,
आज के खर्चे तो ठीक हैं
कल के लिए भी कुछ बचाना होगा
यही पैसा कल का भविष्य बनाएगा
गर कल कोई परेशानी आ जाये
यही ढाल बन कर खड़ा हो जायेगा
कल के स्वप्न पुरे करने हों
या वक्त की आँधियों से लड़ना हो
यही बचत हमें नयी राह दिखायेगा
"इस कविता माध्यम से मैंने बचत का हमारे जीवन में कितना महत्त्व है ,बस इसी को बताने की कोशिश की है। "
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धन्यवाद्
सुनीता श्रीवास्तवा
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