Amma Ka Anchal || अम्मा का आँचल

 

दोस्तों, ये बात तो बचपन की हैं ,तब मम्मी या अम्मा केवल साड़ी ही पहना करती थीं ,और जब हमें स्कूल से ले के आती थीं तो अपना आँचल हमारे सर पर रख देती थीं ,और भी बहुत कुछ करतीं थीं ,वो अपने उस छोटे से आँचल से ,आप सभी ने भी अपने बचपन में ये महसूस किया होगा। 

बड़े सुकून की नींद आती थी 

अम्म जब अपने आँचल में सुलाती थी 

भरी दुपहरी में विद्यालय की छुट्टी होना 

बस्ता कॉपी बाँध कर बाहर को दौड़ना 

किनारे खड़े हो कर उसकी बाट निहारना 

अम्मा आती, माथे से टपकते पसीने को 

अपने उस सूखे आँचल से सुखाती थी 

तब अम्मा छतरी ले के नहीं चला करती थी 

हमको तनिक भी घामा न लग जाये कहीं 

अपना आँचल हमारे माथे ओढ़ाती थी 

वही उसका गमछा था, वही उसका तौलिया 

जब भी रसोई में सेंकती थी चपातियां 

तवे की गर्मी होती ,भाप से भरी पतीली होती 

पसीने से वो तर बितर हो जाया करती 

फिर भी मुखड़े पर एक मीठी मुस्कान लिए 

कपडे के उस छोटे से कोने से पसीना पोंछती 

सबको गरम गरम रोटियां खिलाती थी 

याद है, मुझे जब कभी हमें जरा चोट लग जाये 

जरा सी तबियत भी बिगड़ जाये कभी 

उसी आँचल के कोने में एक गठरी लगाती 

हमारी सलामती की दुआ मांगती थी 

अम्मा का वो आँचल ,केवल आँचल नहीं था 

उसके प्रेम, स्नेह का एक अद्भुत ढाल था 

उस दौर में वही अम्मा का छोटा रूमाल था 

कभी तख्ती का पोंछना ,तो कभी कुछ और 

बहुत अपनापन था,अम्मा के उस आंचल में 

मैं तो आज भी याद कर के मुस्कुराती हूँ 

बाबूजी जब अम्मा को चिढ़ाया करते थे 

कैसे अधरों पर आँचल रख लजाती थी 

बड़े सुकून की नींद आती थी 

अम्म जब अपने आँचल में सुलाती थी 

धन्यवाद् 

सुनीता श्रीवास्तवा 








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