Fir Se Aaya Sawan || फिर से आया सावन
फिर से अबकि आया झूम झूम के सावन
छुम छुम करती गिरती बूँदें छनती पल्लव से
मेघा करते घुमड़ घुमड़ फिरते पागल बन
याद आया एक बार फिर अपना छुटपन
जब रिमझिम बूंदों में खुद को भिगोया करते
कागज की कश्तियां आँगन में बहाया करते
घर के बाहर घुटनों तक पानी लग जाता था
कोई कीट मकोड़े सांप बिच्छू का भय नहीं
फूल पैंट को ऊपर चढ़ा निकल जाया करते
फिर से अबकि आया झूम झूम के सावन
आषाढ़ की तीव्र गर्मी को चीरते हुए
सोंधी सोंधी सी माटी की खुशुबू समेटे हुए
याद बहुत आता है अपना वो लड़कपन
जब आतीं थीं तेज हवा के संग तेज बौछारें
अपने बगीचे नंगे पावं दौड़ जाया करते थे
सोचते कितने सारे गिरे होंगे अमिया जामुन
उन बूंदों की छुवन में कुछ तो बात जरूर थी
वो ख़ुशी ही अलग थी उस अल्हड़पन में
बिना टोकरी ही अमिया बिन लाया करते थे
फिर से अबकि आया झूम झूम के सावन
करते थे बात बादलों से उड़ते थे हवाओं में
बरखा की बूंदों संग झूम झूम नाचा करते थे
कितना सुहाना था अपना वो भोला बचपन
मोटी सी रस्सी डालते थे पीपल के पेड़ों पर
छोटी सी खाट डाल के झूला बनाया करते थे
तब कुछ ज्यादा समझ नहीं आता था ,मगर
दादी संग सावन के गीत गुनगुनाया करते थे
अब मेरी है बारी , मैं ही झूलूँगा सबसे ऊँचा
लम्बी लम्बी पेंग लगा आसमां से बातें करते थे
फिर से अबकि आया झूम झूम के सावन
लेकिन अब वो पहले वाली बात कहाँ
सावन आया बस तारीखें बदली महीना बदला
खिड़की की शीशे पर कुछ बूँदें टपक के आयीं
बाहर नहीं निकलना बीमार पड़ जाओगे
अंदर से ऐसी अम्मा की कड़क आवाज आयी
अब तो बस यादों में रह गया है वो सावन
कहीं खो गयी है वो मीठी मुस्कान
कहीं खो गया है वो नटखट भोलापन
नहीं रही वो बेफिक्र हंसी ,नहीं रहा वो बालपन
फिर से अबकि आया झूम झूम के सावन
धन्यवाद
सुनीता श्रीवास्तवा

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