Ab Wo Baat Kahan II अब वो बात कहाँ
फिर से राखी आयी हर साल की तरह
मगर अब वो बात कहाँ
हर बार की तरह रेशम के धागे ले आयी
रोली चावल की छोटी सी पुड़िया बनायीं
लिफाफे लगाए कोने, जरा हल्दी लगायी
कुछ पैसे डाले,एक छोटी सी चिट्ठी डाली
प्यारे भैया,राखी बाँध के खा लेना मिठाई
पता लिखा और बस,रजिस्टरी कर आयी
वापस आते बस यही था ,सवाल जहन में
जाने कब तलक रहेगी कसक मेरे मन में
जाने कब पहले सा वक्त मिलेगा भाई को
जाने कब बांधूंगी राखी मैं उस कलाई को
फिर से राखी आयी हर साल की तरह
मगर अब वो बात कहाँ
लड़कपन वाला प्नेम जाने, खो गया कहाँ
आपस में लड़ते मगर जान भी छिड़कते
एक दूसरे के ऊपर अपना हक़ समझते
शोर जरूर करते मगर कभी जरूरी हो
तो एक दूसरे को सहारा भी दिया करते
तीन साल हो गए अब भाई की शादी को
बहुत सी चीज़ें बदल गयी हैं रिश्ते में अब
पहले की तरह बात ना होती हमारी अब
बात छोड़ो, फोन भी नहीं आता है अब
वो कहता है क्या करें वक्त नहीं मिलता
ना पहले सा प्यार ना ही कोई अपनापन
न पहले सा अधिकार न ही उतावलापन
अब मैं हूँ, रेशम का धागा और मेरा प्यार
मैंने छोड़ दिए अपने अब सारे इख्तियार
बीते तीन सालों से मैं बस राखी भेज देती
और वो खुद से बाँध लेते हैं,अपनी कलाई
फिर से राखी आयी हर साल की तरह
मगर अब वो बात कहाँ
धन्यवाद्
सुनीता श्रीवास्तवा

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