Agni || अग्नि



दोस्तों ,मैंने एक जलती हुई अंगीठी देखा तो मेरे मन में ये भाव आये और मैंने अपने इस कविता में यही बताने की कोशिश की है कि एक अकेली अग्नि यानि आग के कितने रूप होते हैं और हर  रूप में हमें कुछ न कुछ दे ही जाती है ,यहाँ तक की बुझने के बाद भी हमारे काम आती है और हमें बहुत कुछ सिखा जाती है.. उम्मीद है आपको मेरी ये रचना पसंद आएगी. 

अग्नि जब दीपक से निकलती है 

अंधेरों को चीर चहुँ ऒर रौशनी फैलाती है 

किसी से कोई शिकवा न शिकायत करती 

ना ही अपने वजूद का कभी गुरूर रखती  

वो तो बस अपने प्रकाश की किरणों संग   

भटके पथिक को भी मार्ग दिखा जाती है 

अग्नि जबअंगीठी से निकलती है 

ना जाने  कितनों जनों की भूख मिटाती है 

फिर भी अपने वर्चस्व को नहीं इतराती है 

कभी नहीं धरती भेद अमीर हो या गरीब 

ना सोचती कौन छोटा है या कौन है बड़ा 

बिना स्वार्थ वो अपना काज किये जाती है 

अग्नि जब आरती से निकलती है

अंतर्मन को शुद्ध और पावन कर जाती है 

ऊपर नीचे उठती लौ एक विश्वास जगाती 

राग द्वेष दूर कर देव दर्शन करा जाती है 

कोई अंत नहीं है इस आंच के वर्णन का 

बहुतेरे रंग  में अग्नि परोपकार कर जाती  

मशाल बने तो जीत की मिशाल बन जाये

मन में गर अग्नि हो तो विश्वविजयी  बनाये 

आखिर में अग्नि जब बुझती है 

बुझते बुझते भी बहुत कुछ सिखा जाती है 

चाहे कभी रात डूबी हो घनघोर तिमिर में 

एक छोटी सी चिंगारी सुलगा के तो  देखो 

कैसे तमस के बादल में दीप्ती दिखाती है 

धन्यवाद् 

सुनीता श्रीवास्तवा 





कोई टिप्पणी नहीं

Thanks For Reading This Post