Kitni Achhi Thi Wo Rakhi || कितनी अच्छी थी वो राखी
कितनी अच्छी थी वो राखी
महीने भर पहले से नजरें बिछाया करते
भाई की पसंद की मिठाई आया करती
रंग बिरंगे धागों बीच वो बड़ी वाली राखी
जिस पर लिखा होता था "मेरे प्यारे भैया "
बस वही अपने हाथ में उठा लिया करते
राखी वाले दिन हम थाली सजाया करते
भाई भी सज धज के अलग ही इतराता
राखी बांधने तक कितने नखरे दिखाता
कितनी अच्छी थी वो राखी
उस समय भैया पैसे तो नहीं कमाता था
ना ही कोई नजराना ले आया करता था
राखी बँधायी दस रुपये मिला करता था
तब पैसे हमारे बाबूजी हमें दिया करते
कहने को तो वो केवल दस रुपये होते
पर तब वजूद लाखों में हुआ करता था
कितनी अच्छी थी वो राखी
आज भैया बहुत ज्यादा बड़े हो गए हैं
सूट पैंट वाले आला अफसर हो गए हैं
दफ्तर के कामों में में व्यस्त रहने लगे
समय नहीं अब चंद बातें भी करने की
मेरी शक्ल देख कभी दस शक्लें बनाते
वो अब मुझे आईना दिखाने लग गए हैं
लाखों में रूपये अब कमाने लग गए हैं
भेजते हैं अब वो मुझे बड़े बड़े सौगात
पर उसमें अब रही नहीं वो पुरानी बात
कितनी अच्छी थी वो राखी
कैसा उत्साह था रिश्ते का एहसास था
कैसे कहूँ भाई अपने मन के जज्बात
नहीं चाहिए मुझे ये लाखों वाले उपहार
देदो मुझे वो लड़कपन वाला वही प्यार
फिर से पूछो ना कौन सी राखी बांधेगी
फिर से बिगाड़ दो न मेरे बने हुए बाल
भाई फिर से बीते दिनों को वापस कर
बन जाओ न जैसे पहले हुआ करते थे
कितनी अच्छी थी वो राखी
धन्यावाद
सुनीता श्रीवास्तवा

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