Adbhut Dekhe Najare || अद्भुत देखे नज़ारे

 

कल जब बगीचे  में पग धारे कुछ अद्भुत देखे नज़ारे  

छोटा सा घरौंदा था ना ईंट था ना पत्थर 

ना बालू ना सरिया फिर भी अति सूंदर 

कोई दीवार नहीं था ना ही कोई जंगला 

घास फूस से बना था एक सूंदर बंगला 

गाछ की पत्तियों में किसी को देखा अपने पंख पसारे 

कल जब बगीचे में पग धारे कुछ अद्भुत देखे नज़ारे  

ना कोई छत ना ही कोई छज्जा बनाया 

सुखी पर्णिका जोड़ एक हिस्सा बनाया 

तरु की ओट में छुपा था वो शीशमहल

जिसको एक नन्हे से कारीगर ने बनाया 

मैं एक टक कभी उसे निहारूं, कभी वो मुझे निहारे 

कल जब बगीचे में पग धारे कुछ अद्भुत देखे नज़ारे  

नन्हे से उस घर की नन्ही सी मालकिन 

एक पल इधर फुदकती एक पल उधर 

कभी इस डाल तो  कभी उस डाल पर 

पंखो की लय में उड़ती फिरे फरर फर 

मेरा चंचल मन न माने  देखा करूँ उसे सांझ सकारे 

कल जब बगीचे में पग धारे कुछ अद्भुत देखे नज़ारे  

धन्यवाद् 

सुनीता श्रीवास्तवा 









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