Humse Kinara Mat Karo || हमसे किनारा मत करो


फुर्सते ऐ वक्त कभी तो निकाला करो 

कभी पास में बैठ कर कुछ मेरी सुनो 

कुछ अपने किस्से कथा सुनाया करो 

यूँ जीते जी हमें बेसहारा मत करो 

सुनो,तुम हमसे किनारा मत करो 

माना मशरूफ बहुत ही रहने लगेहो 

हर बात अपनी प्रिये से कहने लगेहो 

सुबह से शाम तक काम  ही काम है  

अपनी रोटी-दाल में उलझने लगे हो 

फिर भी हमें ऐसे नकारा मत करो 

सुनो,तुम हमसे किनारा मत करो 

माना मेरी दवाईयां भी ले के आते हो 

सबेरे का नाश्ता मिल जाया करता है 

सांझ की चाय स्टूल पर मिल जाती है 

रात्रि का आहार भी तुम्हीं खिलाते हो 

मगर क्या इतना ही बहुत है मेरे लिए 

सोचो , ऐसे हमें बेचारा मत करो 

सुनो,तुम हमसे किनारा मत करो 

चलो ये भी मान लिया हम बूढ़े हो गए 

नवीन कोई काम रहा नहीं हमारे पास 

पुराणी नौकरी का अवधी पूरा हो गया 

पोता पोती भी छोटे से अब बड़े हो गए 

कितना समय हो गया तुमसे बात किये 

तुमसे मिले , तुमसे मुलाकात किये हुए 

कभी कभी  दो पल वक्त दे दो हमें भी 

इस तरह तो हमें पराया मत करो 

सुनो,तुम हमसे किनारा मत करो 

सुनो,तुम हमसे किनारा मत करो 

धन्यवाद् 
सुनीता श्रीवास्तवा 



नोट: अक्सर ऐसा होता है कि कुछ लोग अपने घर के बुजुर्ग को रोटी दाल ,दवाईयां तो दे देते हैं ,पर कभी दो पल फुर्सत के निकाल कर उनके पास नहीं बैठते ,सो वो अकेला महसूस करने लगते हैं ,अगर आपके घर में भी ऐसा होता है तो इस पर ध्यान दीजियेगा। इस कविता में भी कुछ ऐसी ही अभिव्यक्ति है। 

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