Desh Ke Kisan Ko || देश के किसान को


घनघोर बारिश हो या जेठ का तेज घाम हो 

हलबैल कुदाल ले चल पड़े अपने काम को 

चाहे मौसम जैसा हो भोर में ही उठ जाते है 

खुद तो उठते हैं साथ बैलों को भी जगाते हैं 

सकारे जो चले फिर लौट के आते शाम को 

हलबैल कुदाल ले चल पड़े अपने काम को

रहते हैं कर्मठ दिन रैन सबकी रोटी के लिए 

ना थकते हैं न रुकते हैं  बस चलते ही रहते

जौ बाजर उगता रहे सो मेहनत करते रहते 

भागदौड़ करते रहते,वक्त नहीं आराम को 

हलबैल कुदाल ले चल पड़े अपने काम को

नींद चैन का त्याग करे वो औरों की खातिर 

चाहे कितने परेशां हो  करते नहीं हैं जाहिर 

कोई तर्रीफ़ भी न करता ,ना होता आभारी 

कोई भी समझ न पाए ,देश के किसान को  

हलबैल कुदाल ले चल पड़े अपने काम को

कभी कभी वो स्वयं ही सुखी रोटी खाते  हैं 

वो भी गर ना मिले तो भूखा ही सो जाते  हैं 

यूँ  ही नहीं,संसार में अन्नदाता कहलाते  हैं  

मुश्किलों से जूझते, रुकते नहीं विश्राम को 

हलबैल कुदाल ले चल पड़े अपने काम को

घनघोर बारिश हो या जेठ का तेज घाम हो 

हलबैल कुदाल ले चल पड़े अपने काम को 

धन्यवाद् 

सुनीता श्रीवास्तवा 







 




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