Dada Ji KI Chadi Hun Main || दादाजी की छड़ी हूँ मैं

 

चुप्पी साधे नजरें झुकाये, बस खड़ी हूँ मैं 

क्योंकि दादाजी की छड़ी हूँ मैं 

भोर में जब भी आँखें खोलें देखें मेरी ऒर 

हाथ बढ़ाके मुझे टटोले बिना मचाये शोर 

संग संग उनके चली चलूँ जाएँ जिस ऒर 

वो बैठे तो मैं बैठी वो खड़े तो  खड़ी हूँ मैं 

क्योंकि दादाजी की छड़ी हूँ मैं 

रोज सबेरे सैर को जाते मैं भी रहती साथ  

एक हाथ है कमर पे उनके,मैं दूसरे हाथ

बच्चे जब शैतानी करते करती उनसे बात 

खाना खाने वो बैठे हैं एक कोने पड़ी हूँ मैं 

क्योंकि दादाजी की छड़ी हूँ मैं

सर्दियों की मीठी धुप हो या गर्मी की शाम 

ठक ठक चलती रहती आती उनके काम

कभी ऊपर कभी नीचे तनिक नहीं विश्राम 

दादाजी जो सोने जाते  सिरहाने जड़ी हूँ मैं 

क्योंकि दादाजी की छड़ी हूँ मैं

वो चलते मैं चलती वो रुकते तो रुक जाती 

मुझसे हरदम बोला करते  ,तू है मेरी साथी 

एक तू ही है जो पलपल काम है मेरे आती 

दादाजी का प्यार हूँ ,जीवन की कड़ी हूँ मैं 

क्योंकि दादाजी की छड़ी हूँ मैं 

चुप्पी साधे नजरें झुकाये, बस खड़ी हूँ मैं 

क्योंकि दादाजी की छड़ी हूँ मैं 

धन्यवाद् 

सुनीता श्रीवास्तवा 








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