Kal Fir Ye Muskaan Ho Na Ho || कल फिर ये मुस्कान हो न हो

 

 


कभी कभी दिल कहता है सारी उलझनें छोड़ 

एक बार फिर से जी भर के खुल के मुस्कुरावूं 

कुछ बिसरे हुए पलछिन को जहन में ले आवूं 

कुछ तकलीफ वाले बीते पल विस्मरण कर दूँ 

ना जाने कल फिर ये मुस्कान हो न हो 

एक बार फिर बिछड़े यारों को मिलने बुलाऊँ 

फिर से उन पुरानी स्मृतियों में विलीन हो जावूं  

कुछ पहर  के लिए फिर से उछल कूद मचावूं 

फिर से एक बार अपने बचपन की ऒर  चलूँ 

क्या पता कल फिर मुलाकात हो न हो 

बेवजह निडर हो बारिश में फिर से भींग जावूं 

घर के अँगनायी में चटकते ओलों को उठा लूँ 

फिर से पानी में छपाक छपाक गोते लगा जावूं 

कागज के पन्नों से फिर से अपनी नाव बनावूँ  

क्या पता कल फिर ये बारिश हो न हो

आज एक बार फिर पास वाले मंदिर हो आवूं 

हाथ जोड़ पूजा करूँ सबके संग आरती गावूं 

दान करूँ ,उछल के मंदिर की घंटियां बजावूं 

पहले की तरह हाथ फैला कर प्रसाद मांग  लूँ 

क्या पता कल फिर ये भक्ति हो न हो

फिर से एक बार सुकून भरी नींद में  सो जावूं 

खट्टे मीठे सूंदर ख्वाबों की दुनिया में खो जावूं 

आज फिर से लम्बे समय तक चिरनिद्रा में रहूं 

लाख जगाने पर भी करवट बदल के रह जावूं 

क्या पता कल ये नींद आये न आये 

धन्यवाद् 

सुनीता श्रीवास्तवा 



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