Do Kamre Ka Makan || दो कमरे का मकान
एक समय था कितनी रौनक रहा करती थी
हाथों की चूड़ियों की खनक हुआ करती थी
कहीं अम्मा की पाजेब की छमछम की धुन
कभीअचानक बाबा के रोष की झनक झन
पैसे की तंगी रहती दो कमरे के मकान में
फिर भी आतेजाते अतिथि घर के प्रांगण में
कभी चाची कभी बुआ तो कभी आती मौसी
सबके साथ रह लेते दो कमरे में ख़ुशी ख़ुशी
लोग ज्यादा पलंग खटिया बिछौने कम होते
मगर फर्श पे ही गुदरी डाल सो जाया करते
घर छोटा रहता था मगर भरा भरा रहता था
शोरशराबा उछल कूद हंसी ठहाके की गूंज
अब वो दो कमरे का बसेरा पांच का हो गया
कल जो खप्पर था वो अब कांच का हो गया
अम्मा बाबा अब रहे नहीं परलोकवासी हुए
बुआ बूढी चाची बूढी मौसी बीमार ही रहती
कोई साथ ले कर आने वाला नहीं है उनको
सो अकेले आवागमन को लाचार ही रहती
सब अपनी दुनिया में बहुत व्यस्त हो गए हैं
अपनी अपनी दिनचर्या में अभ्यस्त हो गए हैं
अब समय कहाँ किसी से मिलने मिलाने का
वो भी समय था जब दो कमरे का निवास था
खुशिया थीं हलचल था ,उफान था जिंदगी थी
अब पांच कमरे का मकान हर ऒर खाली है
हम दो बूढ़ा बूढी कभी इधर जाते कभी उधर
बीते समय को स्मरण कर थोड़ा जाते सिहर
कल चहल पहल हुआ करती थी जिस सेहन
वहां अजीब उदासियों की दमक रहा करती
एक समय था कितनी रौनक रहा करती थी
हाथों की चूड़ियों की खनक हुआ करती थी
धन्यवाद्
सुनीता श्रीवास्तवा

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