Kahan Chali Gayi Tum || कहाँ चली गयी तुम
कहाँ चली गयी तुम
बीच मझधार में छोड़ कर मुझे यूँ अकेला
लगता है जैसे थम गया समय का चक्का
तुम थी तो घर का हर कोना गूंजता होता
सूना कर गयी मकान के हर चौखट को
अब तो मेरा जीवन लगता है एक झमेला
कहाँ चली गयी तुम
बीच मझधार में छोड़ कर मुझे यूँ अकेला
था ही कौन, हम दोनों ही तो थे इस घर में
मैं दूध ले आता तुम चाय बनाया करती थी
मैं राशन ले आता तुम घर सम्भाला करती
मैं बोतल भरता तुम फ्रिज में डाला करती
अब तो सुनी सुनी हो गयी बाग़ बगिया भी
सुख गए गुलाब गुड़हल ,मुरझा गयी बेला
कहाँ चली गयी तुम
बीच मझधार में छोड़ कर मुझे यूँ अकेला
तुम थी तो दीवारें भी कहती बोलती रहतीं
कभी रसोई से तुम्हारे चूड़ियों की खनखन
कभी आँगन में तुम्हारे पायलों की छनछन
सुनो जी,आज खाना क्या बनावूं, पूछती थी
तुम थी तो, हर तरफ संगीत सी गूंजती थी
अब तो पसरा है सन्नाटा तनहा हो गया, मैं
भूली बिसरी बातें ,और तेरी यादों का रेला
कहाँ चली गयी तुम
बीच मझधार में छोड़ कर मुझे यूँ अकेला
धन्यवाद्
सुनीता श्रीवास्तवा
नोट- मेरे मौसी जी के गुजरने के बाद मेरे मौसा जी बहुत अकेला अकेला महसूस करते थे ,तब ये कविता मेरे जहन में आयी थी, वैसे ऐसा बहुत से लोगों के साथ होता है ,एक जीवन संगिनी जब नहीं होती है ,उस पल का एक अहसास है ये। ..
आपको कैसी लगी मन की ये संवेदना ......

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