Kumbha Ka Mela Monalisa || कुम्भ का मेला मोनालिसा

 

वो तो थी बस एक सूंदर कन्या कुमारी 

अपने पिता की भोली सी राजकुमारी 

अपनी बहनों की टोली संग चल पड़ी 

दो जून की रोटी के लिए निकल पड़ी 

अपने हाथों में कुछ कंठी माला लिए 

व्यापार करने  सड़कों पर उतर पड़ी 

कुछ इस गली गए कुछ उस गली गए

कुछ यूँ कुम्भ के मेले बीच छितर गए

तभी अचानक कुछ शोर शराबा शुरू

हुई चलती भीड़ में थोड़ी उथल पुथल  

उस सुकुमारी को कुछ जनों ने रोका  

दो पल को उसको बड़े ध्यान से देखा 

भरी भीड़ से कोई एक आवाज आयी 

अरे ये तो एकदम मोनालिसा जैसी है 

आँखों कोतो देखो झील सी है गहराई 

फिर क्या था आगे आगे वो मोनालिसा 

पीछे पीछे कुम्भ की भीड़ उमड़ पड़ी 

कोई फोटो खींचता कोई रील बनाता 

किसी ने कुछ सच्चेझूठे किस्से बनाये 

किसी ने नयी दुनिया के सपने दिखाए 

खूबसूरत थी वो,उसे तबआभास हुआ 

जब कुम्भ की एक भीड़ इधर उधर से  

घूमती फिरती --उसके पीछे चल पड़ी 

कभी भीड़ उसे देखे कभी भीड़ को वो 

बस सवाल जबाब का सिलसिला शुरू 

कभी मुस्कुराती कभी नजरें चुराती वो 

सभी को उनके जबाब दिए जा रही थी   

मगर उसके अनकहे सवालों का क्या 

कुम्भ ख़तम हुआ,फिर से वही कहानी 

घरवालों के लिए,रोटी तो है ही कमानी

सोचते ही वो मन मन में ही संभल पड़ी 

खुद में विचारते  हुए कंठी माला लेकर 

अगले मेले की तरफ फिर से चल पड़ी 

धन्यवाद् 

सुनीता श्रीवास्तवा 













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