Wo Mehandi Hai II

अपनी डाली से जो टूट के भी मुस्काती है 

फिर पत्थर पर बड़े चाव वो घिसी जाती है 

गूंजती है जब किसी की बेटी की शहनाई

जब भी किसी के आँगन  शुभ घडी आयी 

बिना तकलीफ ,हथेली पर निखर जाती है 

वो मेहंदी है,जो बिखर के भी रंग लाती  है 

होती है बिदा जब-जब किसी की लाड़ली 

उठ जाती है जब किसी गुड़िया की डोली 

और कोई जाये ना जाये साथ बिंदरियों के 

वो मेहंदी है, जो ससुराल भी संग जाती है 

वो मेहंदी है,जो बिखर के भी रंग लाती  है 

तीज त्यौहार अधूरा सा है इसके रंग बिना 

नारी का श्रृंगार अधूरा है इसके संग बिना 

गर जो मेहंदी न उसके साथ रची जाती है 

वो मेहंदी है,जो बिखर के भी रंग लाती  है 

दुल्हन बन सजती संवरती हैं  जब बेटियां 

इसकी खुशबु से महक जाती हैं हथेलियां 

कहने को तो हरे पात हैं अपनी टहनी के  

मगर हथेली में सज कर लाल हो जाती है 

वो मेहंदी है,जो बिखर के भी रंग लाती  है 

चाहे अपने शाख से जुदा हो जाती मेहंदी 

सात वचनों  की माला पिरो जाती मेहंदी 

एक सांवरी को पिया का नाम दे जाती है 

वो मेहंदी है,जो बिखर के भी रंग लाती  है 




धन्यवाद् 
सुनीता श्रीवास्तवा  








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