Gauraiya Aayi || गौरैया आयी
सर्दियों के मीठी धूप में छत पर बैठी हुई थी
बस कुछअपने ही विचारों को समेटी हुई थी
तभी चूंचूं चूं की एक प्यारी सी आवाज आयी
उसे देखने को मैंने अपनी नजरें जैसे घुमाई
छोटे पंखों वाली छोटी सी चिरैया चहचहाई
अम्मा ने बोला देखो,धुप सेंकने हमारे छज्जे
उछल कूद करती मासूम सी गौरैया आयी
चहकती कूदती फुदकती इधर उधर जाती
कभी मेरे बगल बैठती कभी फुर्र उड़ जाती
नन्ही सी जान थी वो मगर अदाएं थीं कमाल
इठलाती बलखाती आगे पीछे मेरे मंडराती
मैं उठी थोड़े से चावल के दाने बिखेर आयी
नन्हे नन्हे चोंच से टूक टूक कर दाने खाती
कुछ खाती कुछ अपने घोंसले भी धर आती
चंचल से छोटी छोटी मनमोहक आँखों को
कभी इधर नचाती तो कभी उधर मटकाती
उसकी अठखेलियां देख मैं भी हर्षित होती
अपनी परेशानियां भुल थोड़ा खुश हो लेती
दिन ढला फिर वो फुर्र अपने घरौंदे पहुंची
सुबह हुई मै फिरकोठे के उस कोने आयी
थोड़े चावल के दाने और पानी का कटोरा
और फिर उसके आने का बेसब्री इन्तजार
बस कुछ ही देर में उनकी पूरी टोली आयी
उछल कूद करती मासूम सी गौरैया आयी
धन्यवाद्
सुनीता श्रीवास्तवा

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